वेद व उपनिषदों का बुद्धि विषयक चिन्तन
वेसे तो हम सभी जानते है कि बुद्धि परमात्मा के द्वारा दिया गया महत्वपूर्ण तत्व है इसी के कारण मानव ने आज इतनी उन्नति की है लेकिन प्राचीन समय में वेदों व उपनिषदों के समय में भी बुद्धि के विषय में क्या विचार थे इसी को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है।
बुद्धि का विकासवेदों व उपनिषदों में ऋषि मुनियों के द्वारा किया गया वैदिक मन्त्रों का निर्माण उनके निश्चयात्मक बौद्धिक चिन्तन को प्रमाणित करता है। बुद्धि की निश्चयात्मक वृति के कारण उन्होंने बुद्धि को अध्यात्म की ओर प्रवृत किया। प्राचीन ऋषि-मुनि मन्त्रों का निर्माण करके उनका बार-बार उच्चारण करके स्मरण करते रहते थे, यही स्मरण शक्ति उनकी बौद्धिक विकास में सहायक सिद्ध होती थी, जिसके कारण वे तत्काल निर्णय लेने में समर्थ थे एवं उनके द्वारा लिया गया निर्णय सत्य व सही होता था। इस आध्यात्मिक बुद्धि के विकास से वे त्रिकाल दृष्टा बने थे। ऋषियों के द्वारा निर्मित मन्त्रोंपच्चारण की विधि आज भी उनके उच्च बौद्धिक ज्ञान का बोध कराती है।
बुद्धि को बढानें के प्रयास
प्राचीन वेदों, उपनिषदों में परमात्म की ओर ले जाने वाली बुद्धि को महत्वपूर्ण तत्त्व मानते हुए प्रत्येक स्तुतियों में उत्तम बुद्धि को बढ़ाने की बात कही गई है यथा-
ओ३म् भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्।। (गायत्री मन्त्र ऋग्वेद में मण्डल ३ सूक्त ६२ मन्त्र १०सामवेद में अध्याय १३ खण्ड ४ सामवेद १४६२, यजुर्वेद में अध्याय ३ मन्त्र ३५,२२/१,३०/२ तथा ३६/३ )
अर्थात्- सब मनुष्यों को चाहिए कि सच्चिदानन्दस्वरूप अर्न्तयामी परमात्मा को छोड़ कर उसके स्थान पर अन्य किसी पदार्थ की उपासना न करें। परमात्मा हमारी बुद्धियों को अधर्म के आचरण से हटाकर धर्म के आचरण में प्रवृत करें और हमारी बुद्धियों को उत्तम-उत्तम गुण, कर्म, स्वभावों से प्रेरित करें ।
मन्त्रों के अध्ययन से यह सिद्ध होता है कि यहाँ गायत्री मन्त्र में निश्चय करने वाली बुद्धि के बल को बढ़ाने की बात कही गई है,
बुद्धि को सूक्ष्म तत्व को जानने का प्रधान साधन माना है। क्योंकि उनका मानना है कि यह बौद्धिक ज्ञान ही है जिससे हम उस सूक्ष्म तत्व को जान सकते है।
एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते।
दृश्यते त्वग्रयया बुद्धया सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः।। १२।। कठोपनिषद्, १/३/१२,
बुद्धि की महत्ता



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