27 सितंबर 2022

वेदों व उपनिषदों का बुद्धि विषयक चिन्तन

 


         वेद व उपनिषदों का बुद्धि विषयक चिन्तन




 

वेसे तो हम सभी जानते है कि बुद्धि परमात्मा के द्वारा दिया गया महत्वपूर्ण तत्व है इसी के कारण मानव ने आज इतनी उन्नति की है लेकिन प्राचीन समय में  वेदों व उपनिषदों के समय में भी बुद्धि के विषय में क्या विचार थे इसी को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है।

    बुद्धि का विकास

वेदों व उपनिषदों में ऋषि मुनियों के द्वारा किया गया वैदिक मन्त्रों का निर्माण उनके निश्चयात्मक बौद्धिक चिन्तन को प्रमाणित करता है। बुद्धि की निश्चयात्मक वृति के कारण उन्होंने बुद्धि को अध्यात्म की ओर प्रवृत किया। प्राचीन ऋषि-मुनि मन्त्रों का निर्माण करके उनका बार-बार उच्चारण करके स्मरण करते रहते थे, यही स्मरण शक्ति उनकी बौद्धिक विकास में सहायक सिद्ध होती थी, जिसके कारण वे तत्काल निर्णय लेने में समर्थ थे एवं उनके द्वारा लिया गया निर्णय सत्य व सही होता था। इस आध्यात्मिक बुद्धि के विकास से वे त्रिकाल दृष्टा  बने थे। ऋषियों के द्वारा निर्मित मन्त्रोंपच्चारण की विधि आज भी उनके उच्च बौद्धिक ज्ञान का बोध कराती है।

  बुद्धि को बढानें के प्रयास
 

प्राचीन वेदों, उपनिषदों में परमात्म की ओर ले जाने वाली बुद्धि को महत्वपूर्ण तत्त्व मानते हुए प्रत्येक स्तुतियों में उत्तम बुद्धि को बढ़ाने की बात कही गई है यथा-

                   

                          ओ३म् भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।                                             
                              धियो यो नः प्रचोदयात्।। (गायत्री मन्त्र ऋग्वेद में मण्डल ३ सूक्त ६२ मन्त्र १०सामवेद में                                                                             अध्याय १३ खण्ड ४ सामवेद १४६२, यजुर्वेद में अध्याय ३ मन्त्र ३५,२२/१,३०/२ तथा ३६/३ ) 

 

अर्थात्- सब मनुष्यों को चाहिए कि सच्चिदानन्दस्वरूप अर्न्तयामी परमात्मा को छोड़ कर उसके स्थान पर अन्य किसी पदार्थ की उपासना न करें। परमात्मा हमारी बुद्धियों को अधर्म के आचरण से हटाकर धर्म के आचरण में प्रवृत करें और हमारी बुद्धियों को उत्तम-उत्तम गुण, कर्म, स्वभावों से प्रेरित करें ।
 मन्त्रों के अध्ययन से यह सिद्ध होता है कि यहाँ गायत्री मन्त्र में निश्चय करने वाली बुद्धि के बल को बढ़ाने की बात कही गई है,





 बुद्धि को सूक्ष्म तत्व को जानने का प्रधान साधन माना है। क्योंकि उनका मानना है कि यह बौद्धिक ज्ञान ही है जिससे हम उस सूक्ष्म तत्व को जान सकते है।

                  एष  सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते।

         दृश्यते त्वग्रयया बुद्धया सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः।। १२।। कठोपनिषद्, १/३/१२,



 
बुद्धि की  महत्ता 

बुद्धि की महत्ता को प्रतिपादित करते हुए  उपनिषदों में  कहा गया  है कि लक्ष्य सिद्ध होने पर बुद्धि निपूर्णता से मन सहित समस्त इन्द्रियों को लक्ष्य तक चलने पर बाध्य किये रहती हैं। यथा 
            
                 यस्तु विज्ञानवान्भवति युक्तेन मनसा सदा।
                                   
               तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः।।६।।   कठोपनिषद्,१,/३,/


जैसे सारथि अपने घोड़ों को वश में करने के लिए सदा उनकी लगाम को कस कर रखता है, उसी प्रकार बुद्धि रुपि सारथि के द्वारा हम जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति कर सकते हैं। 

गीता में बहुत सुन्दर उदाहरण के द्वारा बुद्धि को छोटे से कर्म को महान् बना देने का योग कहा गया हैं।
             
                                    
                दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय।
              बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः।।श्रीमद्भगवद्गीता, २,/४९,


इस यात्रा के लिए कठोपनिषद् में रथ व रथिन् के रूपक की कल्पना करके बुद्धि को सम्पूर्ण रथ को चलाने वाला सारथि बताया गया हैं -
                                       
            आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।
                                       
            बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।। कठोपनिषद्,१,/३,/३



अर्थात् यहाँ आत्मा के शरीर को रथ रूप में, इन्द्रियों को अश्व रूप में, मन को लगाम रूप में और बुद्धि को सारथि के रूप में बताया गया है क्योंकि जीवन की यात्रा तभी पूर्ण कही गई है जब बुद्धि रूपी सारथि को लक्ष्य और मार्ग का ज्ञान हो और उसमें लगाम को अपने वश में रखते हुए अश्वों ठीक मार्ग में ले जाने का सामर्थ्य (योग्यता, बल और कुशलता) हो। 
गीता में भी यही कहा गया है कि - बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।श्रीमद्भगवद्गीता/२,/५०, 

  अर्थात्  बुद्धिमान व्यक्ति अच्छे और बुरे कर्मों के फल से मुक्त  हाे जाते है।

                   कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः।                              

                   जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्।। श्रीमद्भगवद्गीता,/२,/५१,


अर्थात् समत्वबुद्धि से युक्त हुआ पुरुष (ज्ञान- प्राप्ति द्वारा) पाप और पुण्य दोनों इसी लोक में त्याग देता है‘‘ समत्वबुद्धिसे युक्त पुरुष कर्मजनित फल को त्यागकर ज्ञानी हो जीते जी जन्म-बन्धन से मुक्त होकर समस्त उपद्रवों से रहित मोक्ष नामक परम पद को प्राप्त करते हैं’’
अतः उपनिषदों में बुद्धि रूपी सारथि के द्वारा बुद्धि की महत्ता व उसकी प्रधानता बताते हुए उसे अध्यात्म की ओर प्रेरित करते हुए, परमपद की प्राप्ति का प्रधान साधन बताया हैं, और ऐसा इसलिए कहा गया है क्योंकि मनुष्य में बुद्धि तत्त्व की प्रधानता है, और वह अपनी बुद्धि के द्वारा लक्ष्य की प्राप्ति कर सकता है। 
यही कठोपनिषद् में स्पष्ट किया है कि मन हमेशा ही संशय में रहता है कि ‘यह कार्य करे या न करे‘  किन्तु  बुद्धि  उचित अनुचित का निर्णय करके  समाधान प्रस्तुत कर  वस्तु के विषय में निश्चयात्मकता ज्ञान प्रदान करती है। 

बुद्धि की श्रेष्ठता


अतः इसप्रकार उपनिषदों में बुद्धि को श्रेष्ठ बताया गया है जब अपने निश्चयात्मक निर्णयों से मन आदि इन्द्रियों को राग-द्वेष रहित करके अपने वश में कर लेती हैं। ऐसी बुद्धि का आत्मा में निरोध (एक तत्त्व का दूसरे में लीन) होता है तो वह आत्मा भी श्रेष्ठ होकर ईश्वर प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करती है। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि उपनिषदों में बुद्धि पूर्णतया ईश्वर का चिन्तन करने व उसे प्राप्त करने के प्रयास में लगी हुई वर्णित नहीं हुई है बल्कि मनुष्य को उसके वास्तविक लक्ष्य की प्राप्ति का मार्ग भी प्रशस्त करती हुई प्रतीत हो रही है।



                                          


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