28 सितंबर 2022

उपनिषदों में आध्यात्मिकता

 
उपनिषदों में आध्यात्मिकता

आध्यात्मिकता क्या है

 आध्यात्मिकता जो अज्ञात सत्ता के अस्तित्व का  अहसास व जीवन की सत्यता का ज्ञान करवायें उसे आध्यात्मिकता कहा गया है। इस आध्यात्मिकता के लिए चिन्तन,मनन, ध्यान, धारणा,प्राणायाम, योग  इत्यादि के मार्ग  पर चलकर पहुँचा जा सकता है।

उपनिषदों में इसी अध्यात्मिक अनुभूति के लिए उन्होंने शरीर, जीवन, मन और बुद्धि को आध्यात्म के लिए साधन बनाया और वे सीमित आवरण से हटकर उस परम सत्य के मार्ग को खोज सकें ।


आध्यात्मिकता की आवश्यकता क्यों है 

अध्यात्मिकता हमें यह  अहसास  कराती है कि हमें किसी दिव्य शक्ति ने बनाया है और हम उस दिव्य शक्ति का अंश है। इस अहसास से हमें सभी के प्रति प्रेम, दया, सहानुभति की भावना का संचार होता है । यही आध्यात्मकता का संदेश है।
 अध्यात्मिकता से व्यक्ति अपने पराये से मुक्त होकर सर्वात्म हो जाता है। वह प्रत्येक प्राणी के लिए वहीं सोचता है जो स्वयं के प्रति, आध्यात्मिकता से मानव जीवन पूर्णता को प्राप्त करता है। अध्यात्मिकता से बुद्धि निर्मल बन जाती है। इसी का समर्थन श्वेताश्वतर उपनिषद् भी स्पष्ट करता कि लक्ष्य पर पहुँचने के लिए बुद्धि को निर्मल करना आवश्यक है क्योंकि एक दर्पण किसी रूप को तभी प्रतिबिम्बित कर सकता है जब वह स्वच्छ व साफ हो।
यजुर्वेद में ऋषि प्रार्थना करते है कि हे ईश्वर! हमें सन्मार्ग की ओर ले चलों। ऋषियों का तात्पर्य अर्थ यह है कि आध्यात्मिकता व्यक्ति को सही मार्ग दिखाती है।
  जब व्यक्ति आध्यात्मिकता की गहराई में डुबकी लगा कर बाहर निकलता है तब अपने को निभ्रान्त, निर्मल ,संतुष्ट और प्रसन्न अनुभव करता है। आध्यात्मिक जीवन का अर्थ वस्तुओं का त्याग नहीं है अपितु वस्तुओं के प्रति मोह बंधनों को नष्ट कर देना है,  वह तप या सन्यास का जीवन नहीं, अपितु शक्ति ओर ऊर्जा से दमकता हुआ जगत-हित के लिए जीवन जीता  हैं। आध्यात्मिकता व्यक्ति को  दुःखों का कारण बताते हुए उसका निवारण प्रस्तुत करती है  


आध्यात्मिक जीवन कैसा होता है

आध्यात्मिकता को जानने वाले व्यक्ति अपने जीवन में शान्ति, प्रेम एवं प्रसन्नता के भाव में रहते है। वे जो भी कार्य करते है उसमें पूर्णतया सर्मपित हो कर करते है ।
अध्यात्मिकता  आत्म चेतना का विकास करती है 



और संकीर्ण मानसिक जीवन से बाहर निकालकर व्यक्ति को जीवन और सत्य के साथ सामन्जस्य बनाकर सांसारिक मोह, माया से दूर स्वछन्द, आनन्दमय, सृजनात्मक आध्यात्मिक जीवन में प्रविष्ट कराती है।


उपनिषदों में अध्यात्मिकता

इसी अध्यात्मिकता का स्पष्टीकरण हमें बृहदारण्यक उपनिषद् में मिलता है। जिसमें याज्ञवल्क्य अपनी समस्त सम्पति को दो पत्नियों, कात्यायनी और मैत्रेयी में विभाजित करने का प्रस्ताव रखते हैं।  मैत्रेयी उस समय की विदुषी,गुणवान एवं अनेक शास्त्रों की ज्ञाता थी  पूछती है कि क्या धन-सम्पति से भरा सम्पूर्ण जगत् उसे अनन्त जीवन प्रदान कर सकता है? याज्ञवल्क्य कहते हैं, नहीं तुम्हारा जीवन केवल उन मनुष्यों जैसा हो जायेगा जिनके पास बहुत कुछ है, पर धन-सम्पति से अनन्त जीवन की कोई आशा नहीं की जा सकती। ’’मैत्रेयी तब जगत् के ऐश्वर्य को ठुकराते हुए कहती है,‘‘जो धन सम्पति मुझे अमर नहीं बना सकती उसका मै क्या करूंगीऔर अन्त में आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए  सारी  सम्पत्ति कात्यायनी को देकर याज्ञवल्क्य के साथ वन को चली जाती है। यहाँ मैत्रेयी के ये वचन सांसारिक मोह, माया से दूर आत्म ज्ञान की प्राप्ति परम लक्ष्य मानते हुए आध्यात्मिक जीवन का संदेश देते प्रतीत हो रहे है। 

(बृहदारण्यक उपनिषद् २-४-१-२, ४-५-१-१५)



इस आध्यात्मिक विचारधारा के परिणामस्वरूप व्यक्ति वसुधैव कुटुंबकम्के समान समस्त विश्व को एक परिवार मानने लगता है। जहाँ कोई गैर नहीं है किसी से हमारा बैर  नहीं है।

वैदिक चिन्तन पूर्णतया आध्यात्मिकता से ओतप्रोत है यथा-

            सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।

            सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखमाप्नुयात्।।

उपनिषदों में कहा गया है कि मनुष्य की संकटपूर्ण स्थिति का मूल कारण मनुष्य का सीमाबद्ध होकर सोचना है।

        उपनिषदों की शिक्षा है कि अध्यात्मिकता जीवन जीने की कला सिखाती है। वह जीवन को त्यागना नहीं अपितु उसे उद्देश्यपूर्ण रूप से जीने के लिए प्रेरित करती है। उपनिषदों की इसी आध्यात्मिक भावना से मानव जाति को नवीन रूप प्राप्त हुआ है। इस प्रकार आध्यात्मिक तत्ववेता ऋषियों ने इन उपनिषदों में नश्वर संसार में अनिश्वर सत्य को ढूँढ निकालने का स्तुत्य प्रयास किया है। इस प्रयास को सफल बनाने के लिए उन्होंने तीन विशिष्ट शैलियों का प्रयोग किया है -

1 आधिभौतिक शैली के माध्यम से संसार की उत्पत्ति, स्थिति और विनष्टि के कारणों के मूल में जो तत्त्व है, उसे खोज निकाला ।      

2 आधिदेविक शैली के सहारे अनेक नाम-रूपधारी देवताओं में एक परमात्मतत्त्व का निरूपण किया है ।

3 तीसरी आध्यात्मिक शैली के द्वारा आत्मतत्त्व का विश्लेषण किया गया है । 

उपनिषत्कालीन दार्शनिकों ने इन शैलियों या पद्धतियों के माध्यम से जिस परम तत्त्व को खोज निकाला है, वही ब्रह्म है । उपनिषदों में आध्यात्मिकता का जो चिन्तन मिलता है, यह आध्यात्मिक ज्ञान और जीवननिर्धारण की शैली अत्यधिक उपयोगी तथा प्रेरणास्पद है।

अतः इससे यह स्पष्ट होता है कि वर्तमान में मनुष्य को नये रूप से संस्कारित करने की आवश्यकता है। इसप्रकार मनुष्य को संत्रप्त कर देने वाली इस स्थिति से आध्यात्मिकता के द्वारा उबारा जा सकता है।



अधिक जानने के लिए इस video को देख  सकते है-



27 सितंबर 2022

वेदों व उपनिषदों का बुद्धि विषयक चिन्तन

 


         वेद व उपनिषदों का बुद्धि विषयक चिन्तन




 

वेसे तो हम सभी जानते है कि बुद्धि परमात्मा के द्वारा दिया गया महत्वपूर्ण तत्व है इसी के कारण मानव ने आज इतनी उन्नति की है लेकिन प्राचीन समय में  वेदों व उपनिषदों के समय में भी बुद्धि के विषय में क्या विचार थे इसी को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है।

    बुद्धि का विकास

वेदों व उपनिषदों में ऋषि मुनियों के द्वारा किया गया वैदिक मन्त्रों का निर्माण उनके निश्चयात्मक बौद्धिक चिन्तन को प्रमाणित करता है। बुद्धि की निश्चयात्मक वृति के कारण उन्होंने बुद्धि को अध्यात्म की ओर प्रवृत किया। प्राचीन ऋषि-मुनि मन्त्रों का निर्माण करके उनका बार-बार उच्चारण करके स्मरण करते रहते थे, यही स्मरण शक्ति उनकी बौद्धिक विकास में सहायक सिद्ध होती थी, जिसके कारण वे तत्काल निर्णय लेने में समर्थ थे एवं उनके द्वारा लिया गया निर्णय सत्य व सही होता था। इस आध्यात्मिक बुद्धि के विकास से वे त्रिकाल दृष्टा  बने थे। ऋषियों के द्वारा निर्मित मन्त्रोंपच्चारण की विधि आज भी उनके उच्च बौद्धिक ज्ञान का बोध कराती है।

  बुद्धि को बढानें के प्रयास
 

प्राचीन वेदों, उपनिषदों में परमात्म की ओर ले जाने वाली बुद्धि को महत्वपूर्ण तत्त्व मानते हुए प्रत्येक स्तुतियों में उत्तम बुद्धि को बढ़ाने की बात कही गई है यथा-

                   

                          ओ३म् भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।                                             
                              धियो यो नः प्रचोदयात्।। (गायत्री मन्त्र ऋग्वेद में मण्डल ३ सूक्त ६२ मन्त्र १०सामवेद में                                                                             अध्याय १३ खण्ड ४ सामवेद १४६२, यजुर्वेद में अध्याय ३ मन्त्र ३५,२२/१,३०/२ तथा ३६/३ ) 

 

अर्थात्- सब मनुष्यों को चाहिए कि सच्चिदानन्दस्वरूप अर्न्तयामी परमात्मा को छोड़ कर उसके स्थान पर अन्य किसी पदार्थ की उपासना न करें। परमात्मा हमारी बुद्धियों को अधर्म के आचरण से हटाकर धर्म के आचरण में प्रवृत करें और हमारी बुद्धियों को उत्तम-उत्तम गुण, कर्म, स्वभावों से प्रेरित करें ।
 मन्त्रों के अध्ययन से यह सिद्ध होता है कि यहाँ गायत्री मन्त्र में निश्चय करने वाली बुद्धि के बल को बढ़ाने की बात कही गई है,





 बुद्धि को सूक्ष्म तत्व को जानने का प्रधान साधन माना है। क्योंकि उनका मानना है कि यह बौद्धिक ज्ञान ही है जिससे हम उस सूक्ष्म तत्व को जान सकते है।

                  एष  सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते।

         दृश्यते त्वग्रयया बुद्धया सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः।। १२।। कठोपनिषद्, १/३/१२,



 
बुद्धि की  महत्ता 

बुद्धि की महत्ता को प्रतिपादित करते हुए  उपनिषदों में  कहा गया  है कि लक्ष्य सिद्ध होने पर बुद्धि निपूर्णता से मन सहित समस्त इन्द्रियों को लक्ष्य तक चलने पर बाध्य किये रहती हैं। यथा 
            
                 यस्तु विज्ञानवान्भवति युक्तेन मनसा सदा।
                                   
               तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः।।६।।   कठोपनिषद्,१,/३,/


जैसे सारथि अपने घोड़ों को वश में करने के लिए सदा उनकी लगाम को कस कर रखता है, उसी प्रकार बुद्धि रुपि सारथि के द्वारा हम जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति कर सकते हैं। 

गीता में बहुत सुन्दर उदाहरण के द्वारा बुद्धि को छोटे से कर्म को महान् बना देने का योग कहा गया हैं।
             
                                    
                दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय।
              बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः।।श्रीमद्भगवद्गीता, २,/४९,


इस यात्रा के लिए कठोपनिषद् में रथ व रथिन् के रूपक की कल्पना करके बुद्धि को सम्पूर्ण रथ को चलाने वाला सारथि बताया गया हैं -
                                       
            आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।
                                       
            बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।। कठोपनिषद्,१,/३,/३



अर्थात् यहाँ आत्मा के शरीर को रथ रूप में, इन्द्रियों को अश्व रूप में, मन को लगाम रूप में और बुद्धि को सारथि के रूप में बताया गया है क्योंकि जीवन की यात्रा तभी पूर्ण कही गई है जब बुद्धि रूपी सारथि को लक्ष्य और मार्ग का ज्ञान हो और उसमें लगाम को अपने वश में रखते हुए अश्वों ठीक मार्ग में ले जाने का सामर्थ्य (योग्यता, बल और कुशलता) हो। 
गीता में भी यही कहा गया है कि - बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।श्रीमद्भगवद्गीता/२,/५०, 

  अर्थात्  बुद्धिमान व्यक्ति अच्छे और बुरे कर्मों के फल से मुक्त  हाे जाते है।

                   कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः।                              

                   जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्।। श्रीमद्भगवद्गीता,/२,/५१,


अर्थात् समत्वबुद्धि से युक्त हुआ पुरुष (ज्ञान- प्राप्ति द्वारा) पाप और पुण्य दोनों इसी लोक में त्याग देता है‘‘ समत्वबुद्धिसे युक्त पुरुष कर्मजनित फल को त्यागकर ज्ञानी हो जीते जी जन्म-बन्धन से मुक्त होकर समस्त उपद्रवों से रहित मोक्ष नामक परम पद को प्राप्त करते हैं’’
अतः उपनिषदों में बुद्धि रूपी सारथि के द्वारा बुद्धि की महत्ता व उसकी प्रधानता बताते हुए उसे अध्यात्म की ओर प्रेरित करते हुए, परमपद की प्राप्ति का प्रधान साधन बताया हैं, और ऐसा इसलिए कहा गया है क्योंकि मनुष्य में बुद्धि तत्त्व की प्रधानता है, और वह अपनी बुद्धि के द्वारा लक्ष्य की प्राप्ति कर सकता है। 
यही कठोपनिषद् में स्पष्ट किया है कि मन हमेशा ही संशय में रहता है कि ‘यह कार्य करे या न करे‘  किन्तु  बुद्धि  उचित अनुचित का निर्णय करके  समाधान प्रस्तुत कर  वस्तु के विषय में निश्चयात्मकता ज्ञान प्रदान करती है। 

बुद्धि की श्रेष्ठता


अतः इसप्रकार उपनिषदों में बुद्धि को श्रेष्ठ बताया गया है जब अपने निश्चयात्मक निर्णयों से मन आदि इन्द्रियों को राग-द्वेष रहित करके अपने वश में कर लेती हैं। ऐसी बुद्धि का आत्मा में निरोध (एक तत्त्व का दूसरे में लीन) होता है तो वह आत्मा भी श्रेष्ठ होकर ईश्वर प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करती है। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि उपनिषदों में बुद्धि पूर्णतया ईश्वर का चिन्तन करने व उसे प्राप्त करने के प्रयास में लगी हुई वर्णित नहीं हुई है बल्कि मनुष्य को उसके वास्तविक लक्ष्य की प्राप्ति का मार्ग भी प्रशस्त करती हुई प्रतीत हो रही है।



                                          


उपनिषदों में आध्यात्मिकता

  उपनिषदों में आध्यात्मिकता आध्यात्मिकता क्या है  आध्यात्मिकता जो अज्ञात सत्ता के अस्तित्व का   अहसास व जीवन   की सत्यता का   ज्ञान करवायें...