उपनिषदों में आध्यात्मिकता
आध्यात्मिकता क्या है
आध्यात्मिकता जो अज्ञात सत्ता के अस्तित्व का अहसास व जीवन की सत्यता का ज्ञान करवायें उसे आध्यात्मिकता कहा गया है। इस आध्यात्मिकता के लिए चिन्तन,मनन, ध्यान, धारणा,प्राणायाम, योग इत्यादि के मार्ग पर चलकर पहुँचा जा सकता है।
उपनिषदों में इसी अध्यात्मिक अनुभूति के लिए उन्होंने शरीर, जीवन, मन और बुद्धि को आध्यात्म के लिए साधन बनाया और वे सीमित आवरण से हटकर उस परम सत्य के मार्ग को खोज सकें ।
आध्यात्मिकता की आवश्यकता क्यों है
अध्यात्मिकता हमें यह अहसास कराती है कि हमें किसी दिव्य शक्ति ने बनाया है
और हम उस दिव्य शक्ति का अंश है। इस अहसास से हमें सभी के प्रति प्रेम, दया, सहानुभति की
भावना का संचार होता है । यही आध्यात्मकता का संदेश है।
अध्यात्मिकता से
व्यक्ति अपने पराये से मुक्त होकर सर्वात्म हो जाता है। वह प्रत्येक प्राणी के लिए
वहीं सोचता है जो स्वयं के प्रति, आध्यात्मिकता से मानव जीवन पूर्णता को प्राप्त करता है। अध्यात्मिकता
से बुद्धि निर्मल बन जाती है। इसी का समर्थन श्वेताश्वतर उपनिषद् भी स्पष्ट करता
कि लक्ष्य पर पहुँचने के लिए बुद्धि को निर्मल करना आवश्यक है क्योंकि एक दर्पण
किसी रूप को तभी प्रतिबिम्बित कर सकता है जब वह स्वच्छ व साफ हो।
यजुर्वेद में ऋषि प्रार्थना करते है कि हे ईश्वर! हमें
सन्मार्ग की ओर ले चलों। ऋषियों का तात्पर्य अर्थ यह है कि आध्यात्मिकता व्यक्ति
को सही मार्ग दिखाती है।
जब व्यक्ति आध्यात्मिकता की गहराई में डुबकी लगा कर बाहर निकलता है तब अपने को निभ्रान्त, निर्मल ,संतुष्ट और प्रसन्न अनुभव करता है। आध्यात्मिक जीवन का अर्थ
वस्तुओं का त्याग नहीं है अपितु वस्तुओं के प्रति मोह बंधनों को नष्ट कर देना है, वह तप या सन्यास का जीवन नहीं, अपितु शक्ति ओर
ऊर्जा से दमकता हुआ जगत-हित के लिए जीवन जीता हैं। आध्यात्मिकता व्यक्ति को दुःखों का कारण बताते हुए उसका
निवारण प्रस्तुत करती है ।
आध्यात्मिक जीवन कैसा होता है
आध्यात्मिकता
को जानने वाले व्यक्ति अपने जीवन में शान्ति, प्रेम एवं प्रसन्नता के भाव में रहते
है। वे जो भी कार्य करते है उसमें पूर्णतया सर्मपित हो कर करते है ।
अध्यात्मिकता आत्म
चेतना का विकास करती है
और संकीर्ण मानसिक जीवन से बाहर निकालकर व्यक्ति को जीवन और सत्य के साथ सामन्जस्य बनाकर सांसारिक मोह, माया से दूर स्वछन्द, आनन्दमय, सृजनात्मक आध्यात्मिक जीवन में प्रविष्ट कराती है।
उपनिषदों में अध्यात्मिकता
इसी अध्यात्मिकता का स्पष्टीकरण हमें बृहदारण्यक उपनिषद् में मिलता है। जिसमें याज्ञवल्क्य अपनी समस्त सम्पति को दो पत्नियों, कात्यायनी और मैत्रेयी में विभाजित करने का प्रस्ताव रखते हैं। मैत्रेयी उस समय की विदुषी,गुणवान एवं अनेक शास्त्रों की ज्ञाता थी पूछती है कि क्या धन-सम्पति से भरा सम्पूर्ण जगत् उसे अनन्त जीवन प्रदान कर सकता है? याज्ञवल्क्य कहते हैं, नहीं तुम्हारा जीवन केवल उन मनुष्यों जैसा हो जायेगा जिनके पास बहुत कुछ है, पर धन-सम्पति से अनन्त जीवन की कोई आशा नहीं की जा सकती। ’’मैत्रेयी तब जगत् के ऐश्वर्य को ठुकराते हुए कहती है,‘‘जो धन सम्पति मुझे अमर नहीं बना सकती उसका मै क्या करूंगी? और अन्त में आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए सारी सम्पत्ति कात्यायनी को देकर याज्ञवल्क्य के साथ वन को चली जाती है। यहाँ मैत्रेयी के ये वचन सांसारिक मोह, माया से दूर आत्म ज्ञान की प्राप्ति परम लक्ष्य मानते हुए आध्यात्मिक जीवन का संदेश देते प्रतीत हो रहे है।
(बृहदारण्यक उपनिषद् २-४-१-२,
४-५-१-१५)
इस आध्यात्मिक विचारधारा के परिणामस्वरूप व्यक्ति ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के समान समस्त विश्व को एक परिवार मानने लगता है। जहाँ कोई गैर नहीं है किसी से हमारा बैर नहीं है।
वैदिक चिन्तन पूर्णतया आध्यात्मिकता से ओतप्रोत है यथा-
सर्वे
भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे
भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखमाप्नुयात्।।
उपनिषदों में कहा गया है कि मनुष्य की संकटपूर्ण स्थिति का
मूल कारण मनुष्य का सीमाबद्ध होकर सोचना है।
उपनिषदों की शिक्षा है कि अध्यात्मिकता जीवन जीने की कला सिखाती है। वह जीवन
को त्यागना नहीं अपितु उसे उद्देश्यपूर्ण रूप से जीने के लिए प्रेरित करती है।
उपनिषदों की इसी आध्यात्मिक भावना से मानव जाति को नवीन रूप प्राप्त हुआ है। इस
प्रकार आध्यात्मिक तत्ववेता ऋषियों ने इन उपनिषदों में नश्वर संसार में अनिश्वर
सत्य को ढूँढ निकालने का स्तुत्य प्रयास किया है। इस प्रयास को सफल बनाने के लिए
उन्होंने तीन विशिष्ट शैलियों का प्रयोग किया है -
1 आधिभौतिक शैली के माध्यम से संसार की उत्पत्ति, स्थिति
और विनष्टि के कारणों के मूल में जो तत्त्व है, उसे खोज
निकाला ।
2 आधिदेविक शैली के सहारे अनेक नाम-रूपधारी
देवताओं में एक परमात्मतत्त्व का निरूपण किया है ।
3 तीसरी आध्यात्मिक शैली के द्वारा आत्मतत्त्व
का विश्लेषण किया गया है ।
उपनिषत्कालीन दार्शनिकों ने इन शैलियों या पद्धतियों के
माध्यम से जिस परम तत्त्व को खोज निकाला है, वही ब्रह्म है ।
उपनिषदों में आध्यात्मिकता का जो चिन्तन
मिलता है, यह आध्यात्मिक ज्ञान और जीवननिर्धारण की शैली अत्यधिक
उपयोगी तथा प्रेरणास्पद है।
अतः इससे यह स्पष्ट होता है कि वर्तमान में मनुष्य को नये
रूप से संस्कारित करने की आवश्यकता है। इसप्रकार मनुष्य को संत्रप्त कर देने वाली
इस स्थिति से आध्यात्मिकता के द्वारा उबारा जा सकता है।
अधिक जानने के लिए इस video को देख सकते है-





